• टीबी मरीज़ों को समर्थन, सहानुभूति और प्रोत्साहन की ज़रूरत है। यह एक शारीरिक लड़ाई होने के साथ-साथ मानसिक संघर्ष भी है, जिसमें परिवार और दोस्तों की भूमिका खास होती है।"

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  • मैं हाफ मैराथन दौड़ चुका हूं क्योंकि मुझे यह साबित करना था कि टीबी के अलावा भी मेरे जीवन में काफी कुछ है। मैं इस तरह दौड़ा जैसे मुझे किसी चीज़ से फर्क नहीं पड़ता। फिनिश लाइन पर पहुंचने के बाद मेरा पूरा दर्द गायब हो गया। मेरा इलाज तब भी चल रहा था। और इसी वक्त मुझे यह पता चल गया था कि मैंने टीबी को हर तरीके से हरा दिया है! "

    सौरभ की कहानी पढ़ें
  • मुझे लगता है कि टीबी को लेकर चारो तरफ एक खामोशी है, जैसे कि इसमें मेरी गलती हो। मैंने अपना पूरा कॉलेज जीवन यह दिखाते हुए बिताया कि मुझे कुछ नहीं हुआ है। मेरे डॉक्टर ने मुझे सतर्क किया था कि अगर मैंने इस बारे में किसी को बताया तो मेरे साथ भेदभाव होगा। हम टीबी से तब तक नहीं लड़ सकते जब तक इससे जुड़े कलंक को ना मिटा दें!!!"

    नंदिता की कहानी पढ़ें
  • महिलाओं के लिए टीबी से लड़ना अधिक कठिन है। जब हम बिमार होते हैं तब या तो इसमें हमारी गलती होती है या फिर हमारी मांओं की। लेकिन मैं उन लोगों जैसी कभी नहीं थी जिन्होंने यह चुपचाप स्वीकार कर लिया। मैंने समाज के बनाए गए नियमों के हिसाब से कभी जिंदगी को नहीं जिया। इसलिए मैं टीबी को भी मुझे रोकने का मौका नहीं देने वाली थी, खासकर तब जब जिंदगी में अभी काफी कुछ बाकी है।"

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  • टीबी आपके जीवन को निगल सकती है। इस बिमारी की पुष्टि होने के पहले तक मैं जीवन में अपने लक्ष्य के प्रति बेहद केंद्रित था, एक ऐसा व्यक्ति था जो दूसरों से आगे निकलकर अपने लक्ष्य हासिल करना चाहता था। ऐसा लगता था कि मुझे जीवन में रोकने वाला कोई नहीं है। लेकिन टीबी होने के बाद, ऐसा लगा मानो सब कुछ हाथ से निकलता जा रहा था।"

    सौरभ की कहानी पढ़ें
  • जब मैंने पहली बार अपनी बिमारी (टीबी) के बारे में बोलना चाहा तो बहुत सारे लोगों ने मुझे रोका। उन्होंने कहा, ‘वो तुम्हारा अतीत है, किसी को बताने की क्या ज़रूरत है? अब तो तुम पूरी तरह ठीक हो।’ लेकिन मेरा यह मानना है कि छह वर्षों तक चला इलाज और दो सर्जरी की मेरी कहानी बेहद शक्तिशाली है।"

    दीप्ति की कहानी पढ़ें

“सरवाइवर्स अगेंस्ट टीबी” एक समुदाय आधारित अभियान है, जिसका नेतृत्व ऐसे लोग कर रहे हैं, जो टीबी के खिलाफ भारत की लड़ाई को मज़बूत बनाने का काम कर रहे हैं। ये ऐसे लोग हैं, जिनको कभी ना कभी टीबी हुई और उन्होंने इसे पराजित किया है। इन्होंने टीबी की सबसे कठिनतम और पीड़ादायक स्थितियों का सामना किया है। उन सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को समझा है, जिनसे एक टीबी पीड़ित व्यक्ति को गुज़रना पड़ता है। अपने इन्हीं अनुभवों के आधार पर, ये लोग भारत में टीबी उपचार के लिए प्रमुख संबंधित विभागों के समक्ष ऐसे बदलावों की सिफारिश करते हैं, जो अपेक्षाकृत रोग केंद्रित और आसान हैं। हमारा मानना है कि अगर भारत को व्यापक स्तर पर टीबी का समाधान करना है, तो इसकी शुरुआत टीबी से ठीक हुए लोगों के अनुभवों को जानकर, और इन्हें अभियान में शामिल करके हो सकता है। नीतियां बनाने में इनके सुझाव सबसे अधिक प्रभावशाली हो सकते हैं।