दीप्ति

33, मरीज़ों की पैरोकार, मल्टी-ड्रग रेज़िस्टेंट टीबी (एमडीआर टीबी) की भूतपूर्व मरीज़

दीप्ति से संपर्क करें



मेरी कहानी

जब मैंने पहली बार अपनी बिमारी (टीबी) के बारे में बोलना चाहा तो कई लोगों ने मुझे रोका। उन्होंने कहा, ‘वो तुम्हारा अतीत है, किसी को बताने की क्या ज़रूरत है। अब तो तुम पूरी तरह ठीक हो।’ लेकिन मेरा यह मानना है कि छह वर्षों तक चला इलाज और दो सर्जरी, यह अपने आप में एक प्रभावशाली और असाधारण कहानी होगी।

टीबी के खिलाफ मेरी लड़ाई 17 वर्ष पहले शुरू हुई थी, जब मैं एक सोलह साल की छात्रा थी और बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी। लगातार खांसी से परेशान रहने के बाद जब मेरा एक्स-रे हुआ, तब जाकर टीबी की पुष्टि हुई पर डॉक्टर तो कई महीनों तक नहीं जान सके कि मुझे एमडीआर टीबी है।  


टीबी के खिलाफ मेरी लड़ाई 17 वर्ष पहले शुरू हुई थी, जब मैं एक सोलह साल की छात्रा थी और बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी।"

देरी से इलाज शुरू होना मेरी मुश्किलों की शुरुआत थी। एक दवा होती है, जिसका नाम है साइक्लोसेरिन, जो आत्महत्या के विचार पैदा करती है। यह आपको बेहद चिड़चिड़ा बना देती है और आप खुद पर काबू नहीं रख पाते। परिवार के सदस्यों को लगता है कि मरीज़ अपनी बिमारी और हताशा की वजह से ऐसा व्यवहार कर रहा है। लेकिन सच्चाई यह है कि उस दवा के कारण मरीज़ ऐसा करता है।

एक और दवा होती है, क्लोफ़ेज़ीमाइन। इससे आपका रंग सांवला पड़ जाता है। दरअसल यह एक तरह की डाई है। मैं आइना देखने से घबराती थी। अपनी पूरी ज़िंदगी आप खुद को एक खास रूप में देखते हैं और आपको इसकी आदत पड़ जाती है। इसलिए, मेरे चेहरे में आए इस बदलाव ने वाकई मुझे झकझोर दिया। 


अपनी पूरी ज़िंदगी आप खुद को एक खास रूप में देखते हैं और आपको इसकी आदत पड़ जाती है। इसलिए, मेरे चेहरे में आए इस बदलाव ने वाकई मुझे झकझोर दिया।"

जब मैं इन साइड-इफेक्ट (दुष्प्रभाव) से जूझ रही थी, तब मेरे माता-पिता को ना चाहते हुए भी लोगों के कई सवालों का जवाब देना पड़ता था। वर्ष 2000 में, मेरे बाएं फेफड़े की पहली सर्जरी हुई। तब लोग अक्सर पूछते थे कि, ‘अब सर्जरी के बाद इससे शादी कौन करेगा?’ और मुझे लोगों के इस बर्ताव पर काफी हैरानी होती। मैं सोचती थी कि मेरी सर्जरी हो जाने के बाद, क्या लोगों को इस बात की खुशी नहीं होनी चाहिए कि मैं ठीक हो गई हूं? सबको इस बात की चिंता क्यों होने लगी कि 10 साल बाद मुझसे शादी कौन करेगा?

इस दौरान मेरे परिवार ने मुझे बहुत बड़ा सहारा दिया। डॉक्टरों ने तो कह दिया कि मेरे इलाज पर पैसा और समय बर्बाद ना करें, लेकिन वो मेरे साथ बने रहे और इलाज कराते रहे। कई बार मैं उन्हें अपने डर के बारे में नहीं बताना चाहती थी। सिर्फ इसलिए क्योंकि मेरे साथ वो भी मुश्किलों से गुज़र रहे थे। अगर मुझे कोई संक्रामक बिमारी नहीं है, तो मैं सब झेल लूंगी। मैं खुशनसीब थी कि उस दौरान किसी को भी संक्रमण नहीं हुआ, लेकिन अब मुझे यह डर सताता है। 


मैं सोचती थी कि मेरी सर्जरी हो जाने के बाद, क्या लोगों को इस बात की खुशी नहीं होनी चाहिए कि मैं ठीक हो गई हूं? सबको इस बात की चिंता क्यों होने लगी कि 10 साल बाद मुझसे शादी कौन करेगा?"

मेरा इलाज 2005 में पूरा हुआ। 2011 में मैंने नीरज से शादी की। नीरज से मेरी दोस्ती 2004 में एक वेबसाइट पर चैटिंग करते वक्त हुई थी। इस वेबसाइट ने मुझे अपनी कहानी खुल कर बताने का मौका दिया। जब नीरज ने मुझसे शादी की बात कही, तो पहले मैंने टीबी के कारण उसे मना कर दिया था। लेकिन नीरज ने इसकी परवाह नहीं की, और आखिर में उसके माता-पिता भी काफी मददगार रहे।

मैंने 2014 में एक रेडियो इंटरव्यू में मरीज़ों की आवाज उठाते हुए अपनी पहली सार्वजनिक भूमिका अदा की। उसके बाद मुझे बॉलीवुड अभिनेता आमिर खाने के चर्चित टेलीविज़न टॉक शो सत्यमेव जयते में बुलाया गया और अब मैं नियमित रूप से विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों में मरीज़ों की प्रतिनिधि बन कर उनका पक्ष रखती हूं। 


मैंने 2014 में एक रेडियो इंटरव्यू में मरीज़ों की आवाज उठाते हुए अपनी पहली सार्वजनिक भूमिका अदा की।"

मुझे लगता है कि सभी को मेरी कहानी से कुछ सीखना चाहिए। गलत जांच करने वाले डॉक्टर, स्वस्थ होने की आशा रखने वाले मरीज़, कोई भी मेरी कहानी से सबक ले सकता है।

टीवी पर आने के बाद कई मरीज़ों ने मुझसे सलाह मांगनी शुरु की। एमडीआर के इलाज के साइड-इफेक्ट (दुष्प्रभाव) किसी सदमे से कम नहीं होते। बहुत कम मरीज़ों को सही ढंग से इसकी जानकारी दी जाती है। अब तो मैं वो सलाह भी दे सकती हूं जो मुझे नहीं मिल पाई। चुप रहने की हमारी संस्कृति जो टीबी को छिपाए रखती है, अब मेरी बताई जाने वाली हर कहानी से अधिक बेनकाब हो रही है। 


मुझे लगता है कि सभी को मेरी कहानी से कुछ सीखना चाहिए।"

कई महिलाएं बताती हैं कि वे अपने ससुराल में नहीं बता सकती कि उन्हें टीबी है। उन्हें यह भी छिपाना पड़ता है कि उनका इलाज चल रहा है और रात को सबके सो जाने के बाद सारी दवाएं लेती हैं। उनके पति तलाक मांगते हैं, उन्हें घर से निकाल दिया जाता है, उन्हें अपने बच्चों से ही दूर रखा जाता है। सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें टीबी है।

मैं खुशकिस्मत हूं कि मेरे साथ ये सब नहीं हुआ। अभी मेरा पूरा ध्यान सिर्फ़ मरीज़ों की आवाज उठाने पर है, क्योंकि मुझे नहीं लगता कि टीबी के बारे में बोलने के अलावा मैं कुछ और कर सकती हूं। मैं मरीज़ों का इलाज तो नहीं कर सकती, लेकिन दूसरे तरीकों से उनका साथ ज़रूर दे सकती हूं। 


कई महिलाएं बताती हैं कि वे अपने ससुराल में नहीं बता सकती कि उन्हें टीबी है।"

मुझसे संपर्क करें