सौरभ राणे

डेवलपमेंट प्रोफेशनल, 25, मल्टी-ड्रग रेसिस्टमेंट टीबी (एमडीआर-टीबी) सर्वाइवर

सौरभ राणे से संपर्क करें



मेरी कहानी

मुझे याद है, मैं एक आम मेडिकल स्टूडेंट की तरह था। जो अपनी क्लासेस जाने के लिए हमेशा जल्दी में रहता और अधिक से अधिक पढ़ाई करता ताकि जीवन की इस दौड़ में बना रहे। फिर एक दिन मुझे खांसी शुरु हो गई और सब कुछ बदल गया। कई सारी कोशिशों के बावजूद मेरी खांसी, बुखार और सीने का दर्द कम नहीं हुआ।

फिजियोथेरपी के अंतिम वर्ष की परीक्षा पास करने के बाद मैं एक अस्पताल में इंटर्नशिप कर रहा था, कॉलेज खत्म होने के बाद काम कर रहा था। कुछ ही समय में, मुझे भूख लगनी बंद हो गई और मेरा वजन काफी घट गया। मैं एक स्वस्थ आदमी से मरीज़ बन चुका था। इधर मैं अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए अतिरिक्त घंटे काम रहा था ताकि अपने लक्ष्य को पूरा कर सकूं और उधर, अचानक से मेरी ज़िंदगी ही बदल गई।

कुछ ही दिनों में, कई सारी कड़ी जांच के बाद मुझे टीबी का प्राथमिक मरीज़ घोषित कर दिया गया। मेरे एक फेफड़े के आधे हिस्से में तरल पदार्थ भर चुका था और उसे निकाला जाना था। अगले कुछ महीनों में, प्राथमिक इलाज जारी होने के बावजूद मुझे फिर से तेज़ बुखार आने लगा, और आगे वजन भी घटने लगा। अब तक मेरा वजन 66 किलो से घटकर 49 किलो हो चुका था और मैं बड़ी मुश्किल से चल फिर पाता था। 


कुछ ही दिनों में, कई सारी कड़ी जांच के बाद मुझे टीबी का प्राथमिक मरीज़ घोषित कर दिया गया। मेरे एक फेफड़े के आधे हिस्से में तरल पदार्थ भर चुका था और उसे निकाला जाना था।"

यह मेरे संघर्ष की शुरुआत थी। मेरी दोबारा से जांच की गई जिसके बाद पता चला कि मैं बॉर्डरलाइन एक्सटेंन्सिव ड्रग रेजिस्टेंट टीबी (एक्सडीआर) मरीज़ हूं। यह एमडीआर-टीबी का एक अति गंभीर रूप है जिसमें मौत की संभावना 90% रहती है। मुझमें कई सारी दवाओं के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकिसत हो गई थी और फिर एक बिल्कुल अलग इलाज की शुरुआत हुई, जिसमें कई इंजेक्शन के साथ रोज 20 गोलियां खानी थी। दवाओं के गंभीर दुष्परिणाम भी होने लगे जैसे आंशिक अंधापन करीब दो सालों तक रहा।

जैसे-जैसे मेरी हालत में सुधार होता गया, मैंने यह फैसला कर लिया कि टीबी को जीतने नहीं दूंगा। जैसे ही संभव हुआ मैंने घर से काम करना शुरु कर दिया। इसके बाद मैंने घर से थोड़ा निकलना और बाहर की सक्रिय दुनिया से मेलजोल शुरु किया। मैं एक वक्त में दो ज़िंदगियां जी रहा था – शौचालय में छिप कर अपनी दवाएं खा रहा था ताकि किसी को पता ना चले। लांछन के डर से मैंने यह नहीं दिखाया कि मैं कमज़ोर या बिमार हूं और चुपचाप दवाओं के दुष्परिणाम सहता रहा।

जनवरी 2016 में दवाओं के जारी रहते हुए, मैंने 10 किमी की मैराथन में हिस्सा लिया। सिर्फ खुद को यह साबित करने और दुनिया को दिखाने के लिए कि अगर आप पूरी ताकत से लड़ेंगे तो टीबी को हरा सकते हैं। यह तब हुआ जब मैंने टीबी से जीवित बचे एक मरीज़ के रूप में खुलकर बोलना शुरु किया, क्योंकि मुझे पता था कि मेरे जैसे लाखों लोग हैं जिन्हें मुझे सुनने की ज़रूरत है। खुद के लिए नए लक्ष्य बनाते हुए मैंने टीबी का इलाज समाप्त होने और पूरी तरह ठीक हो जाने के बाद 20 हजार फीट ऊंची चढ़ाई पर जाने का फैसला किया। यह टीबी को मेरी आखरी विदाई थी। मैं पूरी तरह इस बात में यकीन करता हूं कि आपको सिर्फ ज़िंदा नहीं रहना है, बल्कि टीबी होने का बावजूद अपने मर्जी से जीना है। 


जनवरी 2016 में दवाओं के जारी रहते हुए, मैंने 10 किमी की मैराथन में हिस्सा लिया। सिर्फ खुद को यह साबित करने और दुनिया को दिखाने के लिए कि अगर आप पूरी ताकत से लड़ेंगे तो टीबी को हरा सकते हैं।"

मैं टीबी को सिर्फ इसलिए हरा सका क्योंकि मैं इलाज का खर्च उठा सका और कुछ दोस्तों ने भी मेरी मदद की। मैं सोचता था कि उनके साथ क्या होता होगा, जिन्हें ना तो कोई मदद मिलती है ना ही टीबी से लड़ने का कोई साधन?

इसलिए मैं टीबी सर्वाइवर्स के समूह – सर्वाइवर्स अगेंस्ट टीबी से जुड़ा। यह समझने के लिए कि टीबी पीड़ितों की मदद करने के लिए हमें क्या परिवर्तन लाना होगा। हमने देखा कि अधिकतर मरीज़ों के लिए समस्याओं की शुरुआत जानकारी की कमी, पारिवार का समर्थन, गलत जांच, महंगा इलाज, पोषण की कमी और परामर्श की गैरमौजूदगी से होती है।

इस बिमारी से अपरिचित लोगों को जानकारी और जागरूकता के जरिये सशक्त बनाना होगा। ऐसा क्यों है कि अधिकतर भारतीयों को टीबी की पर्याप्त जानकारी नहीं है? हर भारतीय के लिए मुफ्त और सही जांच उपलब्ध कराई जानी चाहिए, भले ही वो कहीं भी इलाज क्यों ना कराएं। टीबी की पुष्टि वाले हर मरीज़ को ड्रग रेजिस्टेंस (दवाओं के प्रतिरोध) के लिए जांच की जानी चाहिए। अस्पताल सरकारी हो या निजी, हर भारतीय को यहां मुफ्त इलाज मिलने का अधिकार होना चाहिए। 


मैं सोचता था कि उनके साथ क्या होता होगा, जिन्हें ना तो कोई मदद मिलती है ना ही टीबी से लड़ने का कोई साधन?"

सबसे महत्वपूर्ण यह कि मरीज़ों और उनके परिवारों को सलाह की ज़रूरत है। साथ ही उन्हें पोषण और आर्थिक सहायता भी चाहिए। टीबी की बिमारी बेहिसाब तरीके से गरीबों को प्रभावित करती है। हम कैसे उम्मीद करें की गरीब लोग बिना पर्याप्त पोषण और आर्थिक सुरक्षा के टीबी से लड़ सकेंगे? उनके लिए यह असंभव है और इसमें जरा भी हैरानी की बात नहीं कि लोग इस जहरीले इलाज को बीच में अधूरा छोड़ देते हैं।

हमने इन बातों को सुझावों के रूप में प्रधानमंत्री, स्वास्थ मंत्री और अन्य प्रमुख सरकारी स्वास्थ अधिकारियों को भेजा है। हमारा उद्देश्य इन बदलावों के लिए आवाज़ उठाना है ताकि टीबी मरीज़ों को उस पीड़ा से गुज़रना ना पड़े जिसे हम सह चुके हैं। 


सबसे महत्वपूर्ण यह कि मरीज़ों और उनके परिवारों को सलाह की ज़रूरत है। साथ ही उन्हें पोषण और आर्थिक सहायता भी चाहिए।"

अन्य कई सर्वाइवर्स की तरह मेरा भी यही मानना है कि भारत में टीबी को हराने के लिए पूरी कोशिशें नहीं हो रही। टीबी को हराने के लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र को मिलकर काम करने की जरूरत है। और इसकी शुरुआत उनकी बातें सुनने से होगी जो इस बिमारी से प्रभावित हैं। सिर्फ दवाएं काफी नहीं होती, मरीज़ों को उम्मीद की ज़रूरत है। वो यह चाहते हैं कि समाज उन्हें स्वीकार करे और उनकी मदद करे। खतरे में जी रहे लोगों की सुरक्षा करने की ज़रूरत है। हम मानते हैं कि इनमें से कोई भी काम आसान नहीं, लेकिन टीबी को हराने की शुरुआत तुरंत करनी होगी। हमें उम्मीद है कि सरकार हमारे सुझावों पर ध्यान देगी और पूरी ईमानदारी से टीबी के खिलाफ लड़ाई शुरु होगी। तब तक, हर मिनट टीबी से एक भारतीय की मौत होती रहेगी। 


अन्य कई सर्वाइवर्स की तरह मेरा भी यही मानना है कि भारत में टीबी को हराने के लिए पूरी कोशिशें नहीं हो रही।"

मुझसे संपर्क करें