नंदिता वेंकटेसन

पत्रकार, 26, एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी की भूतपूर्व मरीज़

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मेरी कहानी

भारत में या दुनिया में कहीं भी, एक महिला के लिए टीबी को मात देना अधिक मुश्किल होता है। जब हम बीमार पड़ती हैं, तो लोग इसे हमारी गलती या फिर हमारी माँ की गलती मानते हैं। पर मैं चुपचाप बैठने वाली लड़कियों में से कभी नहीं थी। मैंने कभी ज़िंदगी को समाज के बनाए नियमों के हिसाब से नहीं जिया। इसलिए, मैं टीबी से भी हार नहीं मानने वाली थी क्योंकि अभी मेरी ज़िंदगी में काफी कुछ बाकी था।

ये सच है कि टीबी ने मेरी ज़िंदगी बदल दी है। मैं 18 साल की थी और बड़े उत्साह के साथ कॉलेज जाना शुरू ही किया था। इसी दौरान मुझे पेट में काफी तेज़ दर्द और मितली होने लगी। साथ ही अचानक से भूख भी घटने लगी थी।

शुरुआती जांच में तो यह बताया गया कि मुंबई की बारिश से मुझे वायरल संक्रमण हुआ है। बारिश खत्म हुई, लेकिन मेरी बिमारी नहीं। हर रोज़ शाम के वक्त मुझे बेहद तेज़ बुखार आता और मैं हमेशा थकावट महसूस करती। मैं बड़ी मुश्किल से कुछ खा पा रही थी। 


भारत में या दुनिया में कहीं भी, एक महिला के लिए टीबी को मात देना अधिक मुश्किल होता है।"

ढेर सारे परीक्षणों के बावजूद, किसी नए डॉक्टर के पास जाने तक मेरी जांच एक चुनौती बनी रही। दिलचस्प बात तो यह है कि मैंने ही सबसे पहले आंतों की टीबी होने का संदेह जताया था। किसी को भी इसका शक नहीं था।

आखिरकार एक सीटी स्कैन से मेरे संदेह की पुष्टि हो गई, जिससे मेरा पूरा परिवार सकते में आ गया। टीबी हमारे लिए सिर्फ एक मेडिकल शब्द था, जो हमने सुन रखा था। हमें ऐसा कोई भी व्यक्ति याद नहीं था, जो टीबी के चंगुल से बच पाया हो, या शायद किसी ने इसके बारे में बताया ही नहीं था। टीबी और वह भी आंतों में? मेरे परिवार की हैरानी ठीक वैसी ही थी जैसा टीबी से प्रभावित अन्य परिवारों को टीबी की पुष्टि होने पर होती है – यह बेहद डरावनी और आश्चर्य वाली बात है कि भारत में इसके बारे में कोई बात ही नहीं करता। मुझे तो बाद में पता चला कि अधिकांश डॉक्टर एक्सट्रा-प्लमोनरी टीबी की पहचान भी नहीं कर पाते हैं।

मेरी प्रथम वर्ष की परीक्षाओं के ठीक बीच में मुझे टीबी की पुष्टि हुई थी। दर्द और बुखार के साथ परीक्षाएं देना मेरे लिए बेहद मुश्किल था। इसके ठीक बाद दवाएं भी शुरु हो गईं। भले ही मैंने टीबी से लड़ने की ठान ली थी, पर किसी ने मुझे यह नहीं बताया कि मुझे आगे क्या तकलीफें होंगी। मैं सिर्फ 17 साल की थी और दवाओं के साइड-इफेक्ट्स (दुष्प्रभाव) भयानक थे। मुझे बहुत ज़्यादा मितली आती थी, मनोदशा बार-बार बदलती थी, लगातार कमज़ोरी महसूस होती और इसलिए मुझे कॉलेज से छुट्टी लेनी पड़ी।


मेरी प्रथम वर्ष की परीक्षाओं के ठीक बीच में मुझे टीबी की पुष्टि हुई थी। दर्द और बुखार के साथ परीक्षाएं देना मेरे लिए बेहद मुश्किल था।"

मैं दिन में करीब 15 टैबलेट खा रही थी। मैंने ज़िंदगी में इतनी हताशा कभी नहीं देखी थी। मेरा वजन काफी घट चुका था। लेकिन यहां मुद्दा कुछ और था - अधिकतर महिला टीबी रोगियों की तरह मुझे भी डॉक्टरों ने यह कहा था कि मैं किसी से भी टीबी का ज़िक्र न करूं। मुझे लगा कि टीबी के लिए एक खामोशी सी है, मानो यह मेरी गलती हो। मैंने अपना पूरा कॉलेज यह दिखावा करते हुए बिताया कि मुझे कुछ नहीं हुआ है। मेरे डॉक्टर ने मुझसे कहा था कि टीबी के कारण मेरे साथ भेदभाव होगा। किसी से बात ना कर पाने की इस पाबंदी ने मेरी हताशा और बढ़ा दी। इसलिए मैं डिप्रेशन की शिकार भी हो गई।

डिप्रेशन यानि हताशा के कारण मेरा आत्मविश्वास घटने लगा। मैं कॉलेज के दोस्तों के साथ बाहर जाने से कतराने लगी। उन्हें भी मेरे इस व्यवहार से हैरानी हुई और मेरे बर्ताव को लेकर ताने कसने लगे। उन्हें क्या पता कि हर समय मुझे एक चिड़चिड़ापन परेशान करता था – समय पर घर पहुंचना है और वो 15 गोलियां खानी हैं।

वर्ष 2009 में, आखिर मुझे टीबी से मुक्त घोषित कर दिया गया और दवाइयां भी बंद हो गई। डॉक्टरों ने मुझे भरोसा दिलाया कि अब मुझे कभी भी फिर से टीबी नहीं होगी। इसके बाद भी इस बिमारी से उबरने के लिए मुझे थोड़ा वक्त लग गया। फिर मैंने एक नई शुरुआत के लिए एक नए शहर दिल्ली जाने का फैसला किया।  


डिप्रेशन यानि हताशा के कारण मेरा आत्मविश्वास घटने लगा। मैं कॉलेज के दोस्तों के साथ बाहर जाने से कतराने लगी।"

अब लगने लगा था कि जिंदगी दोबारा पटरी पर आ गई है। मेरे पास एक नया करियर और नए दोस्त थे और मैं इस मौके का पूरा इस्तेमाल करना चाहती थी। मैं 2012 में मुंबई आ गई क्योंकि मुझे फाइनेंस की पढ़ाई करनी थी और फाइनेंशियल जर्नलिज़्म में करियर बनाना था।

वर्ष 2013 में, मुझे पेट में फिर से वही जाना-पहचाना दर्द शुरू हो गया। मैं अपने डॉक्टर के पास गई, जिन्होंने इसे कोई गंभीर समस्या ना मानते हुए मुझे वायरल संक्रमण की दवाएं दी। लेकिन मेरा दर्द बढ़ता ही गया।

मुझे आज भी वो दिन याद है, जब मेरी डॉक्टर ने मुझे कहा कि शायद मुझे फिर से आंतों में टीबी संक्रमण हो गया है। डॉक्टर के सामने बैठे हुए ही मैंने टेबल के नीचे से अपनी मां का हाथ जोर से पकड़ रखा था। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि टीबी वापस लौट सकता है। मेरे ज़हन में वही दर्दनाक यादें लौटने लगी थी। मुझे लगा कि मैं सबकुछ हार चुकी हूं। मेरी डॉक्टर ने कहा कि उन्हें ऐसा कोई मरीज़ याद नहीं है जिसे दोबारा संक्रमण हुआ हो। लेकिन इन बातों का कोई मतलब नहीं था। मैं भी सोच में पड़ गई कि आखिर मैं ही क्यों?

इस बार टीबी पहले से काफी अधिक गंभीर था। दवाओं ने दर्द को ज़रा भी कम नहीं किया। कुछ दिनों बाद मुझे सर्जरी कराने के लिए कहा गया। मैं अस्पतालों से डरती थी लेकिन यहां तो मुझे अपने पापा के जन्मदिन पर ऑपरेशन थियेटेर में ले जाया जा रहा था। सर्जरी के बाद के 10 दिन में, मैं फिर से सामान्य जीवन में लौटने की उम्मीद कर रही थी। आप हर तकलीफ को इसी उम्मीद में सह लेते हैं कि इसका भी अंत होगा। 


मैं अपने डॉक्टर के पास गई, जिन्होंने इसे कोई गंभीर समस्या ना मानते हुए मुझे वायरल संक्रमण की दवाएं दी। लेकिन मेरा दर्द बढ़ता ही गया।"

लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। सर्जरी के बाद, मुझे लगभग 105 डिग्री का अंदरूनी बुखार हो गया। सीटी स्कैन कराते वक्त मेरी सांसे रुक गई और मैं बेहोश होकर गिर पड़ी। मेरी आंते आपस में बुरी तरह उलझ गई थी और एक जानलेवा ब्लॉकेज जैसी स्थिति बन गई।

लगभग दो महीनों तक मुझे अस्पताल में रहना पड़ा। मेरी जान बचाने के लिए तीन बार सर्जरी हुई और बाद में दो सर्जरी और हुई। लगभग दस दिनों तक मैं आईसीयू में रही। यह काफी दर्दनाक, डरावना और बेहद अकेलेपन वाला दौर था। यह सबसे लंबा समय था जिसमें मुझे अपने माता-पिता, परिवार और दोस्तों से दूर रहना पड़ा।

यह एक क्रूर मज़ाक जैसा था। मुझे याद है कि बिस्तर पर पड़े मैं यही सोचती थी कि मुझे कितना कुछ करना था, लेकिन शायद अब कभी नहीं कर पाऊंगी। जब आप मौत को सामने देखते हैं तो यही सोचते हैं कि अगर हम बच गये तो पीछे मुड़कर कभी नहीं देखेंगे।

लेकिन, फिर मेरे अंदर किसी कोने से हिम्मत पैदा हुई - इस बिमारी से लड़ने की हिम्मत। मैंने टीबी पर शोध शुरु किया, अपने डॉक्टर से ढेरों सवाल किये। अच्छे डॉक्टर ऐसे मरीज़ों को पसंद करते हैं। मेरे डॉक्टर ने मुझे वो सब बताया जो मैं जानना चाहती थी। इससे मुझे अधिक सुरक्षा का एहसास होने लगा। 


लगभग दो महीनों तक मुझे अस्पताल में रहना पड़ा। मेरी जान बचाने के लिए तीन बार सर्जरी हुई और बाद में दो सर्जरी और हुई।"

लेकिन मेरी मुश्किल का अंत अभी नहीं था। मैंने 24 नवंबर को अपना जन्मदिन मनाया और दो दिन बाद ही मेरी सुनने की ताकत चली गई। यह मेरी एक दवा का दुष्प्रभाव यानि साइड-इफेक्ट था। मैं एक कम्युनिकेशंस प्रोफेनल हूं और दूसरों को नहीं सुन सकती।

गुजरते वक्त के साथ मैं ठीक होने लगी और अपने मानसिक जख्म भरने के लिए मैंने नृत्य का सहारा लिया। इससे मुझे अपनी निराशा को कुछ रचनात्मक काम में बदलने की मदद मिली और तब से मैं कई सार्वजनिक प्रस्तुतियां दे चुकी हूं।

समाज एक बीमार महिला को सज़ा देने का कोई मौका नहीं छोड़ता। कुछ लोगों ने कहा कि दिल्ली जाने के कारण मुझे दोबारा संक्रमण हुआ। क्या आप एक लड़के से भी ऐसा ही कहेंगे जिसने आईआईटी दिल्ली में दाखिला लिया हो? आप इस तरह की फब्तियां इसलिए कस पाते हैं, क्योंकि मैं एक लड़की हूं। आप कभी एक लड़के से नहीं पूछते कि उससे कौन शादी करेगा? या फिर वो ठीक तो है?

भले ही मैंने टीबी का बहादुरी से मुकाबला किया, पर मैं जानती हूं कि दूसरी महिलाओं के लिए यह मुश्किल काम है। एक लड़की को टीबी होना उसे अपराधी जैसा बनाता है। हमें इसके बारे में बात करना मना है। जब लोगों को पता चलता है तो वे आपसे काफी बेतुके सवाल करते हैं। जैसे, ‘क्या तुम ठीक हो? क्या अब भी तुम्हारे बच्चे हो सकते हैं? तुमसे शादी कौन करेगा?’ मुझसे कई लड़कियों ने संपर्क किया और उन सभी को टीबी के बारे में बात करने की मनाही थी। 


समाज एक बीमार महिला को सज़ा देने का कोई मौका नहीं छोड़ता। कुछ लोगों ने कहा कि दिल्ली जाने के कारण मुझे दोबारा संक्रमण हुआ।"

टीबी से जीवित बचने के लिए मुझे बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। अस्पताल के खर्चों के कारण मेरे परिवार को कर्ज़ लेने पर मजबूर होना पड़ा। उन्हें हमारा घर बेचकर काफी दूर एक छोटे किराये के फ्लैट में जाना पड़ा। मेरी पापा की रिटायरमेंट पूंजी और मेरी खुद की बचत पूंजी मेरे इलाज में खर्च हो गई। मैं इलाज मांगने कभी सरकार के पास नहीं गई। मुझे आरएनटीसीपी के बारे में भी पता नहीं था। अगर पता होता तो मैं वहां जाने की कोशिश करती। इन सबके बारे में पर्याप्त जागरूकता क्यों नहीं है? निजी अस्पतालों में इस बिमारी का इलाज इतना महंगा क्यों है?

मैं एक आत्मनिर्भर और अविवाहित महिला हूं और आपको बता सकती हूं कि महिलाएं काफी अलग तरह की मुश्किलों का सामना करती हैं। हमें काफी अधिक लांछन झेलने पड़ते हैं। आज, हमें ऐसे कार्यक्रमों की ज़रूरत है, जो विशेष रूप से महिलाओं के लिए बने हों। हमें महिला रोगियों और उनके परिवार, दोनों को परामर्श देने की ज़रूरत है। हमें भारत में टीबी से जुड़ी इस खामोशी को तोड़ना होगा, खासकर महिलाओं के लिए।

इस तरह के समाज में आपको समझने वाला और साथ देने वाला जीवनसाथी मिलना मुश्किल होगा। मुझे टीबी हुआ इसमें मेरी गलती नहीं है, लेकिन अब मैंने इस बिमारी को हराकर एक नई ज़िंदगी बनाई है – यह जीत मेरे नाम दर्ज हो चुकी है। आप तब तक महिलाओं के लिए टीबी को खत्म नहीं कर सकते जब तक आप इससे जुड़ी खामोशी नहीं तोड़ेंगे। टीबी से लड़ना कोई शर्म या घिनौनी बात नहीं है। आपको इस खौफनाक बिमारी को हराने पर गर्व होना चाहिए। 


इस तरह के समाज में आपको समझने वाला और साथ देने वाला जीवनसाथी मिलना मुश्किल होगा।"

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